सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कक्षा 6 के छात्रों को भी कक्षा 7 की तरह बोर्ड परीक्षा से राहत

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को निर्देश दिया है कि वे त्रि-भाषा नीति के तहत कक्षा 6 के विद्यार्थियों को भी वही छूट प्रदान करें, जो कक्षा 7, 8 और 9 के छात्रों को दी गई है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने यह स्पष्ट किया कि छठी कक्षा के छात्रों को भी 10वीं कक्षा में पहुंचने पर तीसरी भाषा की बोर्ड परीक्षा देने से अलग रखा जाए और उनका मूल्यांकन केवल विद्यालय स्तर पर आंतरिक रूप से ही हो।

इस मामले में अदालत ने सीबीएसई को चार सप्ताह के भीतर औपचारिक जवाबी हलफनामा दायर करने का समय दिया है। इसके बाद यदि कोई प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) देना हो, तो उसके लिए दो सप्ताह की मोहलत तय की गई है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद निर्धारित की है। इससे पूर्व, 17 सितंबर को भी शीर्ष अदालत ने सीबीएसई से इस नीति को कक्षा 6 के छात्रों के लिए 2027 के शैक्षणिक सत्र से लागू करने पर विचार करने को कहा था।

केंद्र और सीबीएसई का तुरंत लागू करने का रुख

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और सीबीएसई की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कक्षा 6 के विद्यार्थियों को छूट दिए जाने का विरोध किया। सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि देश भर के लगभग 28,000 सीबीएसई संबद्ध स्कूलों में से करीब 99 प्रतिशत ने त्रि-भाषा नीति को लागू कर लिया है और वहां जरूरी शिक्षण सामग्री भी मुहैया कराई जा चुकी है। उन्होंने पीठ को बताया कि केवल 1.2 प्रतिशत स्कूल ही इस बदलाव को अपनाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, इसलिए सरकार चालू शैक्षणिक वर्ष से ही इसे लागू करने के पक्ष में है।

चरणबद्ध शुरुआत और आवश्यक संसाधनों की तैयारी

सॉलिसिटर जनरल के तर्कों के बावजूद, पीठ ने छात्रों को अंतरिम राहत देने पर जोर दिया। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यह नीति की ‘सॉफ्ट लॉन्च’ (सहज शुरुआत) का मामला है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि कक्षा 6 के वर्तमान बैच को 2027 तक का समय मिल जाता है, तो विद्यालयों को योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करने, नई किताबें जुटाने और शिक्षण संसाधन तैयार करने का पर्याप्त अवसर मिल सकेगा।

पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि जिन स्कूलों और याचिकाकर्ताओं को बदलाव में व्यावहारिक दिक्कतें आ रही हैं, उनसे सीधे संवाद करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जा सकती है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने नई समिति के गठन का विरोध करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अदालत से एक स्पष्ट और ठोस न्यायिक निर्णय की आवश्यकता है।

बीच सत्र में भाषा बदलने पर याचिकाकर्ताओं की आपत्ति

वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि यह समस्या केवल तीसरी भाषा शामिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से एक भाषा पढ़ रहे विद्यार्थियों को अचानक बीच में दूसरी भाषा चुनने के लिए बाध्य करने से जुड़ी है। उन्होंने याचिकाकर्ता दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कक्षा 4 से स्पैनिश पढ़ रहे विद्यार्थियों को नए नियमों के चलते अचानक संस्कृत पढ़ने के लिए विवश किया जा रहा है, जिससे उनकी निरंतर पढ़ाई पर असर पड़ रहा है।

सीबीएसई सर्कुलर और नई शिक्षा नीति का ढांचा

सीबीएसई ने 29 जून को जारी परिपत्र में व्यवस्था की थी कि वर्तमान में कक्षा 7, 8 और 9 में पढ़ रहे जिन विद्यार्थियों ने दो गैर-भारतीय भाषाएं चुनी हैं, उन्हें कक्षा 10 तक एक अतिरिक्त भारतीय भाषा पढ़नी होगी। हालांकि, यह तीसरी भाषा केवल स्कूल स्तर पर आंतरिक मूल्यांकन के दायरे में होगी और कक्षा 10 में पहुंचने पर इसकी कोई केंद्रीकृत बोर्ड परीक्षा नहीं ली जाएगी।

पाठ्यक्रम में यह संशोधन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और स्कूल शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ-एसई) 2023 के तहत किया गया है। इस ढांचे के अनुसार विद्यार्थियों को तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य है, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं (भारतीय भाषाएं) होनी चाहिए। सीबीएसई की सूची में हिंदी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, उड़िया और असमिया को भारतीय भाषाओं में रखा गया है; जबकि अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, अरबी और स्पैनिश को गैर-देशी भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया गया है।

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