बिना वाजिब वजह अलग रहने और कमाने में सक्षम शिक्षित पत्नी धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की मांग करने वाली एक महिला की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी बिना किसी पर्याप्त या उचित कारण के अपने पति से अलग रह रही है और वह शिक्षित होने के साथ खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत मेंटेनेंस पाने की हकदार नहीं है। जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि CrPC की धारा 125(4) का वैधानिक प्रावधान किसी भी पत्नी को भरण-पोषण पाने से रोकता है, यदि वह बिना किसी उचित आधार के अपने पति के साथ वैवाहिक घर में रहने से इनकार करती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पत्नी और विपक्षी संख्या 2 (पति) का विवाह 16 अप्रैल 2022 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इसके कुछ समय बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट में CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की अर्जी दाखिल की। उसने आरोप लगाया कि ससुराल में उसके साथ दहेज के लिए क्रूरता की गई और उसे वैवाहिक घर छोड़ने पर मजबूर किया गया। उसने यह भी दलील दी कि पर्याप्त आर्थिक साधन होने के बावजूद उसके पति ने उसकी अनदेखी की और भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया।

हालांकि, इटावा के फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने क्रिमिनल केस संख्या 933/2022 में पत्नी की मेंटेनेंस अर्जी खारिज कर दी थी। इस आदेश के खिलाफ पत्नी ने CrPC की धारा 397 सपठित धारा 401 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल किया।

पक्षकारों की दलीलें

रिवीजनकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि वह विपक्षी संख्या 2 की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। यह दलील दी गई कि वह एक शिक्षित महिला है लेकिन फिलहाल बेरोजगार है, जबकि उसका पति एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और प्रति माह लगभग 1,50,000 रुपये कमाता है। वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों और कानून की अनदेखी करते हुए अर्जी खारिज की है। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह साबित करते हैं कि पत्नी के पास अलग रहने के वैध कारण थे और वह पूरी तरह से आश्रित है, जबकि पति की आय काफी अच्छी है।

इसके विपरीत, विपक्षी संख्या 2 (पति) के वकील और राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों के सही मूल्यांकन के बाद एक सुविचारित आदेश पारित किया है। उन्होंने दलील दी कि पति बेरोजगार है, उसके अपने नाम पर कोई चल या अचल संपत्ति नहीं है और वह अपनी आजीविका के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण की अर्जी को मुख्य रूप से दो ठोस और परस्पर पुष्ट आधारों पर खारिज किया था।

अलग रहने के कारण पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“ट्रायल कोर्ट ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट रूप से यह तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज किया है कि रिवीजनकर्ता एक शिक्षित महिला है और वह बिना किसी पर्याप्त या उचित कारण के अपने पति से अलग रह रही है। CrPC की धारा 125(4) स्पष्ट रूप से वैधानिक रोक लगाती है, जिसके तहत यदि कोई पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, तो वह अपने पति से भरण-पोषण भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य दर्शाते हैं कि पति ने उसे वापस लाने के लिए सद्भावनापूर्ण प्रयास किए, जिसे उसने ठुकरा दिया। वह रक्षाबंधन पर अपनी मर्जी से अपने चाचा के साथ मायके गई थी और उसके बाद से बिना किसी पर्याप्त कारण के वापस आने से इनकार कर दिया।”

पत्नी की शैक्षणिक योग्यता और कमाने की क्षमता को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा:

“रिकॉर्ड से यह स्थापित हुआ है कि रिवीजनकर्ता एक सुशिक्षित महिला है और वह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। CrPC की धारा 125 का मूल उद्देश्य बेसहारापन और भुखमरी को रोकना है। चूंकि रिवीजनकर्ता अच्छी तरह से शिक्षित और कमाने में सक्षम है, इसलिए वह कानून के तहत आवश्यक ‘अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ’ व्यक्ति के दायरे में नहीं आती है।”

रिवीजन क्षेत्राधिकार की सीमित सीमाओं पर जोर देते हुए अदालत ने आगे स्पष्ट किया:

“यह कानून का सुस्थापित सिद्धांत है कि CrPC की धारा 397/401 के तहत रिवीजन अधिकार क्षेत्र का दायरा बेहद सीमित है। हाईकोर्ट अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए अपीलीय अदालत के रूप में कार्य नहीं करता है। हस्तक्षेप केवल तभी उचित होता है जब निचली अदालत के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से विकृत, अवैध या अधिकार क्षेत्र की गंभीर त्रुटि से ग्रस्त पाए जाएं।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष पूरी तरह से तथ्यात्मक हैं और मुकदमे के दौरान पेश साक्ष्यों पर आधारित हैं। फैमिली कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर CrPC की धारा 125(4) के प्रावधानों को सही तरीके से लागू किया है। आदेश में ऐसी कोई अवैधता, अनियमितता या विकृति नहीं है जिसमें हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।

अदालत ने कहा कि रिवीजन याचिका में कोई मेरिट नहीं है और इसे खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती कंचन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 7741 / 2025
पीठ: जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

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