सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट मामला: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट का आदेश किया रद्द, शिकायतकर्ता को शपथपत्र की खामी सुधारने का निर्देश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु की एक सेशंस कोर्ट द्वारा सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के मामले में सीधे अदालत द्वारा जांच का आदेश देने पर सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत को शिकायतकर्ता को उसके शपथपत्र में मौजूद तकनीकी खामी को दुरुस्त करने का अवसर देना चाहिए था और उसके बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 के तहत तय वैधानिक प्रक्रिया के तहत जांच पर विचार करना चाहिए था।

यह मामला सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट से संबंधित है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, उनके पुत्र व कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे और अन्य पारिवारिक सदस्य ट्रस्टी हैं। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने बेंगलुरु की 81वीं एडिशनल सिटी सिविल एवं सेशंस कोर्ट के 11 अगस्त के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह निर्देश जारी किया।

प्रक्रिया न्याय की सहायिका है, जल्लाद नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि शपथपत्र में मौजूद तकनीकी खामी ऐसी थी जिसे सुधारा जा सकता था। इसके आधार पर पूरी कार्यवाही की दिशा बदलकर बीएनएसएस की धारा 223 के तहत अदालती जांच में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए था।

अदालत ने कहा, “शिकायतकर्ता को खामी दूर करने और अदालत के समक्ष विधिवत सत्यापित शपथपत्र पेश करने का निर्देश दिया जा सकता था। प्रक्रिया निसंदेह न्याय की सहायिका है; इसे न्याय का जल्लाद बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

पीठ ने आगे कहा कि सत्यापन खंड में किसी अपूर्णता या खामी की वेदी पर सच की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती। अदालत ने सेशंस कोर्ट के 11 अगस्त के आदेश के उस कार्यकारी हिस्से को निरस्त कर दिया जिसमें धारा 223 के तहत जांच का आदेश दिया गया था। अदालत ने मामला वापस सेशंस कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता को शपथपत्र सुधारने का मौका दिया जाए और उसके बाद बीएनएसएस की धारा 175 के तहत कानूनी प्रावधानों और सुरक्षा उपायों के अनुरूप आगे की कार्यवाही की जाए।

आरोपों के गुण-दोष पर टिप्पणी से इनकार

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने शिकायत में दर्ज आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बाद शिकायत को जांच के लिए भेजा जाना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय करना पूरी तरह से सेशंस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है।

अदालत ने कहा कि जब लोकसेवकों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप हों, तो विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। ऐसे मामलों में साक्ष्य आमतौर पर किसी निजी शिकायतकर्ता के पास उपलब्ध होने के बजाय सरकारी फाइलों, आधिकारिक पत्राचार, फाइलों की आवाजाही और प्रशासनिक समितियों के निर्णयों में दर्ज होते हैं।

जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि किसी आम नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने स्तर पर यह साबित करे कि संबंधित फाइलों पर किन अधिकारियों ने काम किया, ट्रस्ट को अनुसूचित जाति वर्ग के तहत किस आधार पर पात्र माना गया, या ट्रस्टियों और सरकारी कर्मियों के बीच कोई मिलीभगत थी अथवा नहीं।

क्या है भूखंड आवंटन से जुड़ा विवाद?

यह विवाद लांछामुक्त कर्नाटक वेदिके के अध्यक्ष विजयराघव मराठे द्वारा दायर एक निजी शिकायत से शुरू हुआ। उन्होंने बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) द्वारा सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को नागरिक सुविधा (सीए) भूखंड के आवंटन में व्यापक अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत पुलिस जांच की मांग की थी।

सेशंस कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट का गठन मूल रूप से 1994 में हुआ था, जिसमें राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित पांच ट्रस्टी थे। वर्ष 2010 में निष्पादित एक पूरक ट्रस्ट डीड के माध्यम से उनकी पत्नी राधाबाई एम. खरगे और उनके दो बेटों—राहुल खरगे तथा कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे को भी ट्रस्टी बनाया गया।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट के उद्देश्य जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के बिना आम जनता के लिए हैं, फिर भी उसने बीडीए से अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत नागरिक सुविधा भूखंड की मांग की। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट ने लीज राशि में 50 प्रतिशत की छूट प्राप्त की। इसके अलावा, पहले आवंटित 8,125 वर्ग मीटर (करीब दो एकड़) भूखंड के स्थान पर प्रभाव का दुरुपयोग और बीडीए कर्मियों की मिलीभगत से पॉश बीटीएम फोर्थ स्टेज में 8,002 वर्ग मीटर का वैकल्पिक भूखंड हासिल किया।

सेशंस कोर्ट ने ट्रस्ट के दस्तावेजों का परीक्षण कर यह माना था कि यह एक धर्मार्थ और धर्मनिरपेक्ष संगठन है। अदालत ने लीज में 50 प्रतिशत छूट और वैकल्पिक भूखंड दिए जाने के तथ्यों को भी दर्ज किया था, लेकिन शिकायत के साथ लगे शपथपत्र में खामियों के चलते धारा 175(3) के तहत पुलिस जांच का निर्देश देने से मना कर दिया था और धारा 223 के तहत न्यायिक जांच का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब सेशंस कोर्ट को पहले शिकायतकर्ता को शपथपत्र सुधारने का अवसर देना होगा और फिर नए सिरे से धारा 175 के तहत जांच की आवश्यकता पर विचार करना होगा।

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