असम के गोलपारा में घरों पर बुलडोजर चलाने पर गुवाहाटी हाईकोर्ट सख्त, पूछा- 24 घंटे के नोटिस पर कार्रवाई की क्या जल्दबाजी थी?

असम के गोलपारा जिले में बिना पूरा मौका दिए आवासीय मकानों को ढहाए जाने पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों को विवादित जमीन पर आगे किसी भी तरह की कार्रवाई करने से रोक दिया है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों से सवाल किया कि आखिर ऐसी कौन सी आपात स्थिति या आसन्न खतरा था, जिसके चलते 24 घंटे का संक्षिप्त नोटिस देकर निजी पट्टा भूमि पर बने घरों को आनन-फानन में गिरा दिया गया।

अदालत ने प्रथम दृष्टया इस पूरी कार्रवाई को गैरकानूनी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर तय की गई है।

नोटिस के बाद तड़के हुई कार्रवाई पर उठे सवाल

यह मामला मटिया राजस्व सर्किल के तहत आने वाले क्षेत्र का है, जहां के 21 प्रभावित निवासियों ने राज्य सरकार, गोलपारा के जिला आयुक्त और मटिया के सर्किल अधिकारी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. बोरठाकुर ने 7 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस देवाशीष बरुआ की पीठ को बताया कि सर्किल अधिकारी ने 5 सितंबर को नोटिस जारी किए थे। इनमें आरोप लगाया गया था कि कृषि भूमि पर घर बनाए गए हैं और 24 घंटे के भीतर निर्माण न हटाने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

अधिवक्ता ने पीठ के समक्ष दलील दी कि निवासियों को अपना पक्ष रखने या कोई जवाब देने का कोई अवसर दिए बिना ही प्रशासन ने 7 सितंबर की तड़के ही उनके आवासीय मकानों को ढहा दिया।

हाईकोर्ट ने की तल्ख टिप्पणी, नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन का हवाला

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस देवाशीष बरुआ ने मटिया राजस्व सर्किल अधिकारी के इस कदम पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि यह कार्रवाई प्रथम दृष्टया अवैध, अनाधिकृत और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिलने वाले नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन लगती है।

पीठ ने टिप्पणी की कि जब कई स्थापित कानूनी सिद्धांत मौजूद हैं, तब ऐसे दौर में याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का मौका दिए बिना इस तरह से नोटिस जारी करना पूरी तरह से अकल्पनीय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी किए गए नोटिसों से ऐसा कोई आसन्न खतरा जाहिर नहीं होता, जिसके आधार पर निजी भूमि पर इस तरह के कठोर अधिकारों का इस्तेमाल किया जाए।

सरकारी वकील को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने जिला आयुक्त और सर्किल अधिकारी की ओर से पेश सरकारी वकील एस. एस. रॉय को निर्देश दिया कि वे संबंधित अधिकारियों से विस्तृत निर्देश हासिल करें। अदालत ने सरकार से अगली सुनवाई में यह बताने को कहा है कि याचिकाकर्ताओं के घरों को गिराने के लिए ऐसा कौन सा आसन्न खतरा था, जिसके चलते इतनी जल्दबाजी में यह कदम उठाना पड़ा।

कानूनी प्रावधानों पर अदालत की नजर

सुनवाई के दौरान अदालत ने असम कृषि भूमि (गैर-कृषि उद्देश्य के लिए पुनर्वर्गीकरण और हस्तांतरण का विनियमन) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों का भी संज्ञान लिया। पीठ ने दर्ज किया कि कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति अपने रहने के लिए अधिकतम दो मंजिला मकान बनाता है और वह जमीन एक बीघा या उससे कम है, तो कृषि भूमि के ऐसे उपयोग या हस्तांतरण के लिए जिला आयुक्त की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होती है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने नोटिसों की वैधता पर विचार करते हुए केवल इस कानूनी प्रावधान को दर्ज किया है और फिलहाल यह अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है कि याचिकाकर्ताओं के अलग-अलग घर सभी कानूनी शर्तों को पूरा करते थे या नहीं।

नुकसान का ब्योरा दर्ज कराने की अनुमति

हाईकोर्ट ने मामले में औपचारिक नोटिस जारी करते हुए 21 याचिकाकर्ताओं को एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी है। इसके जरिए वे अपने मकान गिराए जाने के घटनाक्रम और संपत्ति के नुकसान का पूरा ब्योरा अदालत के रिकॉर्ड पर रख सकेंगे। साथ ही, पीठ ने जिला आयुक्त और मटिया के सर्किल अधिकारी को 11 सितंबर तक उक्त जमीनों पर किसी भी तरह की आगे की कार्रवाई से बचने का स्पष्ट निर्देश दिया है।

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