कंगन पुलिस स्टेशन ज़मीन विवाद: सुप्रीम कोर्ट का जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 से किराया और मुआवजा देने का निर्देश

गांदरबल जिले के कंगन में सात दशक पहले पुलिस स्टेशन बनाने के लिए बिना अधिग्रहण प्रक्रिया के कब्जाई गई ज़मीन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित भू-स्वामी के वंशज अब्दुल रशीद वानी को वर्ष 1953 से अब तक का किराया और ज़मीन का मुआवजा प्रदान करे।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने माना कि लगभग 70 साल की लंबी अवधि बीत जाने के कारण वर्तमान बाज़ार दर पर नए सिरे से ज़मीन अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। इसके बावजूद, पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन के गैर-कानूनी कदम का नुकसान याचिकाकर्ता को नहीं उठाना चाहिए।

2021 से माना जाएगा अधिग्रहण का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय भूमि अधिग्रहण अधिकारी को आदेश दिया है कि वह वानी द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के वर्ष 2021 को आधार बनाकर अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करे। इसके साथ ही, अधिकारी को 1953 से ज़मीन के इस्तेमाल के बदले किराए की गणना कर राशि का निर्धारण करने का निर्देश दिया गया है। मुआवजे और किराए की अंतिम राशि का फैसला जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट द्वारा किया जाएगा।

बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हुआ था कब्जा

यह मामला गांदरबल जिले के मौजा कंगन स्थित सर्वे नंबर 525 की सात कनाल और 18 मरला ज़मीन से संबंधित है। राज्य अधिकारियों ने 1953 में कंगन पुलिस स्टेशन का निर्माण करने के लिए बिना किसी formal अधिग्रहण या मुआवजा भुगतान के इस संपत्ति पर कब्जा कर लिया था। मूल मालिकों के वंशज वानी ने ज़मीन की वापसी, औपचारिक अधिग्रहण, अथवा 1953 से ज़मीन के उपयोग के एवज में मुआवजे और किराए की मांग को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू की थी।

हाईकोर्ट का खारिज फैसला और याचिकाकर्ता का तर्क

वानी ने अपने अधिवक्ता महफूज़ अहसान नाज़की के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इससे पहले जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की डिवीजन पीठ ने 28 जून 2022 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह मामला 68 साल की अत्यधिक देरी से प्रभावित है और इतने लंबे समय बाद किसी समाप्त हो चुके कारण को दोबारा जीवित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लगभग 42 वर्षीय याचिकाकर्ता बालिग होने के दो दशक बाद तक कानूनी उपचार मांगने में विफल रहे।

अदालत के समक्ष वानी ने तर्क दिया था कि उनके पिता अनपढ़ थे, जिसके कारण वे समय पर कानूनी कदम नहीं उठा सके। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले दो दशकों में शासन को दिए गए ज्ञापनों से जुड़े रिकॉर्ड 2014 की भीषण बाढ़ में नष्ट हो गए थे। हालांकि, साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया था। वहीं, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने तर्क दिया था कि पुलिस विभाग 1953 से इस स्थान पर शांतिपूर्ण काबिज है और सात दशक बाद पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करना कठिन है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top