केवल डायरेक्टर होने के आधार पर चेक बाउंस का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता; शिकायत में विशिष्ट भूमिका का उल्लेख जरूरी: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 141 के तहत किसी आरोपी कंपनी में सिर्फ डायरेक्टर का पद संभालने मात्र से किसी व्यक्ति पर चेक अनादर (बाउंस) का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और न ही उसे परोक्ष (प्रतिनिधिक) रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। एक पुनरीक्षण याचिका पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के साथ पठित धारा 141 के तहत किसी डायरेक्टर के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शिकायत में स्पष्ट, ठोस और असंदिग्ध तथ्य होने चाहिए, जिनसे यह साबित हो सके कि घटना के समय वह डायरेक्टर कंपनी के कामकाज का प्रभारी और उसके संचालन के लिए जिम्मेदार था। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत शिकायत में केवल सामान्य बातें कही गई थीं और याचिकाकर्ता की न तो कोई प्रत्यक्ष भूमिका बताई गई थी और न ही यह स्पष्ट किया गया था कि चेक पर किसने हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद हाईकोर्ट ने डायरेक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता संजीव शुक्ला (जिन्हें संजीव शुक्ला के नाम से भी जाना जाता है) ने कलकत्ता के 11वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित शिकायत वाद संख्या CS/104375/2021 को रद्द करने की मांग को लेकर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 और 141 के तहत दर्ज किया गया था।

यह शिकायत आराधना निर्माण एलएलपी द्वारा क्रेडफोर्स एशिया लिमिटेड (आरोपी संख्या 1) और याचिकाकर्ता सहित उसके तीन डायरेक्टरों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी। याचिकाकर्ता को केवल डायरेक्टर पद पर होने के कारण आरोपी बनाया गया था। शिकायत में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता संबंधित समय पर कंपनी के कारोबार के संचालन का प्रभारी और उसके लिए जिम्मेदार था। साथ ही, कथित लेन-देन या चेक जारी करने व उस पर हस्ताक्षर करने में भी उसकी किसी भूमिका का उल्लेख नहीं था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संदीपान गांगुली ने दलील दी कि शिकायतकर्ता नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 141 की अनिवार्य कानूनी शर्तों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा है। उन्होंने कहा कि धारा 141 एक दंडात्मक प्रावधान के तहत प्रतिनिधिक आपराधिक दायित्व का कानूनी सिद्धांत बनाती है, इसलिए इसका कड़ाई से अर्थ निकाला जाना चाहिए।

वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि धारा 141 में प्रयुक्त वाक्यांश “प्रभारी था” और “कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए कंपनी के प्रति जिम्मेदार था” के बीच में संयोजक शब्द “और” का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि ये दोनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक शिकायत में यह स्पष्ट रूप से न बताया जाए कि कोई डायरेक्टर किस प्रकार और किस तरह से कंपनी के कारोबार का प्रभारी और जिम्मेदार था, तब तक उसके खिलाफ मुकदमा कानूनी रूप से टिक नहीं सकता। उन्होंने रेखांकित किया कि शिकायत में याचिकाकर्ता की कंपनी के मामलों में भूमिका, लेन-देन में भागीदारी, चेक जारी करने या किसी भी प्रत्यक्ष कार्य का कोई विवरण नहीं है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने अशोक शेवकरमानी एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य, सिबी थॉमस बनाम सोमानी सेरामिक्स लिमिटेड और राहुल तांतिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के फैसलों का हवाला दिया।

दूसरी तरफ, विधिवत नोटिस दिए जाने के बावजूद विपक्षी पक्ष आराधना निर्माण एलएलपी की ओर से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।

अदालत का विश्लेषण

शिकायत और संबंधित कानूनी प्रावधानों का अवलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पदनाम के आधार पर सभी डायरेक्टरों पर अपने आप आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की:

“एनआई एक्ट की धारा 138 के साथ पठित धारा 141 के तहत किसी कंपनी के डायरेक्टरों के खिलाफ मुकदमा शुरू करने के लिए, संबंधित लेन-देन में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका के संबंध में शिकायत में एक विशिष्ट आरोप होना चाहिए। यह भी निर्धारित है कि आरोप स्पष्ट और असंदिग्ध होने चाहिए जो यह दर्शाएं कि डायरेक्टर कंपनी के व्यवसाय के प्रभारी और जिम्मेदार थे। ऐसा अनावश्यक मुकदमों को हतोत्साहित करने और कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था।”

अदालत ने आगे कहा:

“यह स्थापित कानून है कि शिकायत याचिका में शिकायतकर्ता को यह बताना आवश्यक है कि कोई डायरेक्टर किस प्रकार और किस रीति से आरोपी कंपनी के व्यवसाय का प्रभारी था और आरोपी कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए जिम्मेदार था। प्रत्येक डायरेक्टर का आरोपी कंपनी के व्यवसाय का प्रभारी होना न तो आवश्यक है और न ही वास्तव में वह प्रभारी होता है। शिकायतकर्ता के साथ कथित लेन-देन में किसी डायरेक्टर की भागीदारी के संबंध में विशिष्ट भूमिका के अभाव में, एनआई एक्ट की धारा 141 के तहत किसी भी डायरेक्टर को शामिल नहीं किया जा सकता है।”

मजिस्ट्रेट अदालत में दायर शिकायत का अवलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने केवल यह सामान्य दावा किया था कि तीनों डायरेक्टर कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज और नियमित मामलों के प्रबंधन में लगे हुए थे। अदालत ने रेखांकित किया कि चेक जारी करने के संबंध में भी केवल अस्पष्ट रूप से यह लिखा गया था कि इसे “आरोपी व्यक्तियों द्वारा” जारी किया गया था। अदालत ने कहा:

“शिकायत याचिका में शिकायतकर्ता ने कहीं भी यह नहीं बताया है कि किस डायरेक्टर/आरोपी व्यक्ति ने चेक पर हस्ताक्षर किए थे।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले एन. हरिहर कृष्णन बनाम जे. थॉमस का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि चेक जारी करने वाले व्यक्ति के नाम का खुलासा करना उन बुनियादी तथ्यात्मक आरोपों में से एक है जिनका शिकायत में होना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने धारा 141 के तहत प्रतिनिधिक दायित्व से जुड़े प्रमुख निर्णयों का भी विश्लेषण किया:

  • पवन कुमार गोयल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि केवल डायरेक्टर होना धारा 141 के तहत दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इसमें कोई स्वतः मान लिया जाने वाला दायित्व नहीं होता। प्रबंध निदेशक, संयुक्त प्रबंध निदेशक या चेक पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति ही सीधे जिम्मेदार होते हैं।
  • शालीन खेमानी एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य: कलकत्ता हाईकोर्ट ने माना था कि शिकायत में किसी प्रत्यक्ष भूमिका का विवरण दिए बिना केवल डायरेक्टर या अतिरिक्त डायरेक्टर होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे कंपनी के मामलों के प्रभारी थे।
  • सुनील तोदी एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य (सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई और अनीता हाड़ा के संदर्भ में): सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि विशिष्ट वैधानिक प्रावधानों और व्यक्तिगत सक्रिय भूमिका के अभाव में डायरेक्टरों पर स्वतः प्रतिनिधिक दायित्व लागू नहीं किया जा सकता।
  • सुनीता पालिता बनाम मैसर्स पंचमी स्टोन क्वारी: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बिना किसी विशिष्ट भूमिका के सिर्फ सामान्य कथन के आधार पर सभी डायरेक्टरों को आरोपी बनाना धारा 141 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
  • अशोक शेवकरमानी एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य: सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि धारा 141(1) में प्रयुक्त “प्रभारी था” और “कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए जिम्मेदार था” को अलग-अलग करके नहीं, बल्कि एक साथ पढ़ा जाना चाहिए।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रस्तुत शिकायत में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 141 की अनिवार्य कानूनी जरूरतें पूरी तरह नदारद थीं।

अदालत ने निर्णय दिया:

“शिकायत याचिका से यह स्पष्ट है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 141 के तहत आवश्यक शर्तें, जैसा कि पवन कुमार गोयल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (पैरा 31) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित किया गया है, इस मामले में पूरी तरह से अनुपस्थित हैं और ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता के संबंध में कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना स्पष्ट रूप से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”

तदनुसार, जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) ने पुनरीक्षण याचिका (CRR 2620/2024) को स्वीकार कर लिया और 11वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, कलकत्ता के समक्ष लंबित वाद संख्या CS/104375/2021 की कार्यवाही को याचिकाकर्ता संजीव शुक्ला उर्फ संजीव शुक्ला के संबंध में रद्द कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजीव शुक्ला उर्फ संजीव शुक्ला बनाम आराधना निर्माण एलएलपी
वाद संख्या: सीआरआर 2620 / 2024
पीठ: जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल)
निर्णय की तिथि: 28.08.2026

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