वकील की 4.8 करोड़ रुपये फीस वसूली की याचिकाएं खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट जाने का दिया निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग से लगभग 4.8 करोड़ रुपये की बकाया फीस वसूलने की मांग करने वाले एक अधिवक्ता की चार रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि वकीलों की फीस से जुड़े संविदात्मक विवादों का निपटारा रिट अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने अधिवक्ता को अपनी रकम की वसूली के लिए सक्षम सिविल कोर्ट जाने का निर्देश दिया।

फीस विवाद निजी मामला, मध्यस्थता से हल होना चाहिए

जस्टिस शेखर बी. सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की पीठ ने 14 अगस्त को दिए अपने आदेश में कहा कि किसी वकील और उसके मुवक्किल के बीच फीस का निर्धारण एक निजी और विशेषाधिकार प्राप्त मामला है। अदालत के अनुसार, ऐसे विवादों को अदालत में लाने के बजाय मध्यस्थता या सुलह के जरिए ही सुलझाया जाना चाहिए, भले ही इसमें एक पक्ष राज्य सरकार ही क्यों न हो।

लिखित स्वीकारोक्ति या स्वीकृत बिल पेश करने में नाकाम

संविधान के अनुच्छेद 226 का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिट याचिकाओं के जरिए तथ्यों के जटिल और विवादित प्रश्नों को हल नहीं किया जा सकता। मामले के रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता राज्य अधिकारियों का कोई ऐसा लिखित पत्र, स्वीकृत फीस बिल या देनदारी की स्वीकारोक्ति पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो सके कि सरकार ने बकाया राशि स्वीकार की है।

शासनादेश और कार्य अवधि को लेकर विरोधाभास

मामले में मुख्य विवाद 2009 और 2011 के शासनादेशों की व्याख्या को लेकर था। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह सीतापुर, लखनऊ, हरदोई और रायबरेली जिलों से जुड़े विशेष अपीलों के मामलों में विशेष वकील के रूप में तैनात थे और इन शासनादेशों के तहत अधिकतम फीस पाने के हकदार हैं। उन्होंने दावा किया कि वे लगभग 16 वर्षों तक राज्य सरकार के वकील रहे।

दूसरी ओर, बेसिक शिक्षा विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों ने तर्क दिया कि रिट याचिका के जरिए फीस वसूली कानूनी रूप से पोषणीय नहीं है। विभाग ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता को बेसिक शिक्षा परिषद के लिए पैनल वकील बनाया गया था, जिन्हें अक्टूबर 2011 में हटा दिया गया था। राज्य सरकार के अनुसार, उनके कई दावे पैनल से हटाए जाने के बाद की अवधि के हैं। इसके अलावा, विभाग ने यह भी कहा कि शासनादेश में केवल फीस की एक सीमा तय की गई थी और दोनों पक्षों के बीच किसी तय राशि पर सहमति नहीं बनी थी।

समय-सीमा के तर्क पर विचार से इनकार

सुनवाई के दौरान राज्य अधिकारियों ने यह भी आपत्ति जताई कि याचिकाकर्ता 2009 से बकाया फीस का दावा 16 साल के लंबे अंतराल के बाद कर रहे हैं, इसलिए यह मांग समय-सीमा (लिमिटेशन) से बाहर है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस सवाल पर फैसला देने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि समय-सीमा का मुद्दा कानून और तथ्यों से जुड़ा मिला-जुला प्रश्न है। चूंकि याचिकाएं पोषणीय न होने के कारण ही खारिज की जा रही हैं, इसलिए इस पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने सभी चार याचिकाएं खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट में अपना दावा दाखिल करने की छूट दे दी।

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